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27 January 2014

जय हो (2014)

एक्शन पोर्न 

हॉलीवुड सुपरहीरोज और सुपरस्टार रजनी की फिल्मों की तरह एक सलमान खान फिल्म को रिव्यु की ज़रुरत नहीं पड़ती। लोग इसे किसी भी हालत में पसंद करेंगे।

बॉलीवुड में एक दौर था जब वक़्त से काफी आगे की फिल्में बनती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से वक़्त से काफी पीछे की फिल्में बन रही है। इनमें से ज्यादातर फिल्में रीमेक्स या सीक्वल होती है, जिसकी कहानी १९८० या '९० के दशक की होती है। जय हो उसी सीरीज की एक कड़ी है। 

जय हो, साउथ की फिल्म स्टालिन की रीमेक है, जो हॉलीवुड फिल्म पे इट फॉरएवर से इंस्पायर्ड थी। देसी सुपरहीरो सलमान ने इस फिल्म में एक आम आदमी की भूमिका निभायी है, जिसके अंदर ज़ुल्म और अत्याचार होता देख अंदर का शेर जाग उठता है। वास्तव में, जय हो एक एक्शन पोर्न है, जिसमें सलमान हर ५ मिनट बाद, शेर की दहाड़ के साथ, गुंडों की हड्डियां तोड़ते नज़र आते हैं। 

भाई कहते हैं कि थैंक यू मत बोलो। इसके बदले तीन लोगों की मदद करो, और उनसे आगे तीन लोगों की मदद करने को कहो। फिल्म के सभी पात्र इसे अनगिनत बार दोहराते हैं। ऐसे में आपको लगता है कि आप थिएटर से निकलने के बाद तीन लोगों को फिल्म ना देखने के लिए बोलें, और उनसे कहें कि वो आगे तीन लोगों को फिल्म देखने के लिए मना करे। 

आखिरकार, एंड क्रेडिट्स शुरू होता है। और यही फिल्म की सबसे अच्छी बात थी। 

रेटिंग: *

21 August 2013

वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा (2013)

शोएब, जिसे फिल्म में बार बार शोहेब बोला जाता है, बम्बई का सबसे बड़ा गैंगस्टर है। पुलिस को उसकी तलाश है। हम उसे कभी क्रिकेट मैच के दौरान स्टेडियम में देखते हैं, तो कभी किसी फिल्म के सेट और अवार्ड शो में। सरेआम हत्या करने के बाद वो बड़े आराम से पुलिस स्टेशन से घूम के आ जाता है। इतना ही नहीं, हम उसे वेश बदल कर टैक्सी चलाते, पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचते और गाते भी देख सकते हैं। 

बॉलीवुड में हर दूसरी फिल्म का सीक्वल बनना अब आम बात हो गयी है। ज्यादातर सीक्वल्स (जोकि हड़बड़ी में बनायी गयी होती है) से स्टोरी और स्क्रिप्ट गायब होती है। इसके बावजूद कभी कभी निर्देशक दर्शकों को बाँधने में कामयाब हो जाते हैं। उदाहरण के लिये इसी साल रिलीज़ हुई साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स में तिग्मांशु बिना स्टोरी के भी दर्शकों को पौने तीन घंटे तक बाँधने में सफल हुये थे। लेकिन वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा शुरू से अंत तक उबाऊ और बोझिल है। 

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी स्टोरी और स्क्रिप्ट (अगर फिल्म में वाकई है तो) है। यहाँ मिलन लुथरिया कंफ्यूज नज़र आते हैं। फिल्म ना तो गैंगस्टर ड्रामा है, ना ही लव ट्रायंगल। फिल्म के तीनों मुख्य पात्र यहाँ शायराना अंदाज़ में धांसू डायलॉगबाज़ी करते नज़र आते हैं।

अक्षय और इमरान खान अपने अपने रोल में फिट नहीं हैं। अक्षय ने इससे पहले कई नेगेटिव किरदार निभाये हैं। लेकिन यहाँ उन्होंने पुरी तरह से ओवर-एक्टिंग करी है। यहां तक की इमरान हाशमी ने इस फिल्म के प्रीक्वल में उनसे कहीं बेहतर एक्टिंग की थी। 

इमरान खान पर गैंगस्टर रोल सूट नहीं करता। सोनाक्षी जितनी बेहतरीन लूटेरा में थी, उतनी ही खराब इस फिल्म में। केवल पितोबाश और अभिमन्यु सिंह कुछ प्रभावित करते हैं, जो फिल्म के महज दो-चार दृश्यों में नज़र आते हैं। 

कुल मिला के वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा  देखने की बजाय वन्स अपॉन … मुंबई (2010) को दोबारा देखना अच्छा रहेगा। वो इससे कहीं ज्यादा, ज्यादा बेहतर फिल्म थी। 

रेटिंग: *

14 August 2013

चेन्नई एक्सप्रेस (2013)

"Critically Disaster & Box Office Acclaimed" इस का इस्तेमाल हम सलमान खान और अक्षय कुमार की ज्यादातर फिल्मों के लिये कर सकते हैं। इन स्टार्स के प्रशंसक इनकी फिल्मों की जी भर कर तारीफ करते हैं, समीक्षकों को गालियाँ देते हैं और फिल्म के कलेक्शन्स को लेकर खासे उत्साहित रहते हैं। चेन्नई एक्सप्रेस से इस श्रेणी में शाहरुख खान भी शामिल हो जायेंगे। 

भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार के फिल्मकार हैं। पहले वो जिनकी फिल्में ज्यादातर विदेशी (फिल्म) फेस्टिवल्स में दिखाई जाती हैं। ऐसी फिल्में यहाँ थियेटर में रिलीज़ होने को तरसती हैं और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन्स से कोसों दूर रहती है। दुसरे फ़िल्मकार भारतीय फेस्टिवल्स (दिवाली, ईद) के लिये फिल्में बनाते हैं। इनका मुख्य मकसद कम-से-कम १०० करोड़ (बॉलीवुड में आजकल ये ट्रेंड बन चुका है) कमाना होता है। 

निर्देशक रोहित शेट्टी की ये नौवीं फिल्म है। वह इकलौते ऐसे निर्देशक हैं जिनकी चार फिल्में (बोल बच्चन, सिंघम, गोलमाल 3 और अब चेन्नई एक्सप्रेस) १०० करोड़ क्लब में शामिल हैं। अजय देवगन के साथ लगातार आठ फिल्में बना चुके रोहित ने इस फिल्म में पहली बार शाहरुख़ के साथ काम किया है। 

शाहरुख़ ने वास्तव में, इस फिल्म के जरिये अपने आप को ट्रिब्यूट दिया है। इसमें उन्होंने राहुल का किरदार निभाया है। यह उनकी कई रोमांटिक हिट फिल्मों के किरदारों का भी नाम था। अपनी पिछली कई फिल्मों के गानों को वह और दीपिका यहाँ अजीबोगरीब तरीके से इस्तेमाल करते हैं। 

अपने दादा की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों को प्रवाहित करने रामेश्वरम (या छुट्टी मनाने गोवा) जा रहे राहुल की मुलाक़ात मीनाम्मा (दीपिका) से चेन्नई एक्सप्रेस में होती है। मीना को जबरन उसके गाँव कोम्बन ले जाया जा रहा होता है। उसके साथ राहुल को भी उसके गाँव जाना पड़ता है। हालांकि राहुल को कोम्बन गाँव जाने की जरूरत क्यों पड़ती है, ये स्पष्ट नहीं होता। 

गाँव में मीना के पिता का काफी दबदबा है। उसके पिता उसकी शादी तांगाबल्ली (निकितन धीर) के साथ करना चाहते हैं। इस शादी से बचने के लिये भागती मीना आखिर में राहुल को चाहने लगती है। 

दीपिका के ट्रेन में, और फिर बांकी फिल्म में बोलने का तरीका मेल नहीं खाता। फिल्म के अंत तक तो टोन उत्तर भारतीय हो जाता है। 

मुसीबत के समय भी राहुल का मजाकियापन अजीब सा लगता है। जोक्स फिल्म में जबरन ठुंसे गये हैं। लेकिन इस सब में लॉजिक ढूंढने का कोई तुक नहीं बनता। आखिरकार ये रोहित शेट्टी और टीम की एंटरटेनर है। 


शाहरुख़ अपने करियर के उस दौर में हैं, जहां उनके अभिनय के बारे में बात करना व्यर्थ होगा। लेकिन वह इससे बेहतर फिल्में कर सकते हैं। और उन्हें करनी चाहिये। 

रेटिंग: **

30 July 2013

भाग मिल्खा भाग (2013)

‘भाग मिल्खा भाग।’ मिल्खा के पिता ने मरने से पहले उससे ये तीन शब्द कहे थे। वे लोग गोविन्दपुरा (मुल्तान) के रहने वाले थे जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में चला गया। आज़ादी के बाद हुए क़त्ल-ए-आम में मिल्खा ने अपने घरवालों को खो दिया। इसके बाद वह अपनी बहन के पास दिल्ली आ गया। यहाँ से मिल्खा के फौज में भर्ती होने और फिर ऐथलीट बनने का सफ़र शुरू होता है।

यह फिल्म 'फ्लाइंग सिख' मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित है। प्रसून जोशी ने काफी रिसर्च करने के बाद फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी। इसके लिये उन्होंने काफी वक़्त मिल्खा सिंह के साथ गुज़ारा। 

चाकू चलाने वाले बच्चे से लेकर फ्लाइंग सिख बनने की मिल्खा सिंह की कहानी को राकेश मेहरा ने बखूबी पेश किया है। फिल्म की शुरुआत 1960 रोम ओलंपिक से होती है। बदकिस्मती से मिल्खा उस दौड़ में पदक जीतने से चूक गये थे। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने के लिये फ्रेंडशिप गेम का आयोजन होता है, जिसमे बंटवारे के समय की त्रासदी के कारण मिल्खा हिस्सा लेने से इनकार कर देते हैं। मिल्खा को मनाने के लिये नेहरु अपने सहयोगी को चंडीगढ़ भेजते हैं। दिल्ली से चंडीगढ़ के इस सफ़र के दौरान हम मिल्खा की ज़िन्दगी से रूबरू होते हैं। 

फरहान अख्तर ने मिल्खा सिंह की भूमिका में जान डाल दी है। इस के लिए कई महीनों तक की गयी उनकी मेहनत साफ़ दिखाई देती है। वह निश्चित तौर पर नेशनल अवार्ड के हक़दार हैं। इस रोल को शायद ही कोई और इतने समर्पण के साथ निभा पाता। यह रोल पहले अक्षय कुमार करने वाले थे। अगर वह ये भूमिका निभाते तो शायद ये एक अलग ही प्रकार की फिल्म होती। 

फरहान के बाद दिव्या दत्ता सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। उन्होंने मिल्खा की बड़ी बहन इसरी कौर का किरदार निभाया है। मिल्खा और इसरी के बीच के ज्यादातर दृश्य दर्शकों की आँखें नम कर देती है। इसके अलावा जपतेज़ सिंह (बाल मिल्खा), पवन मल्होत्रा, योगराज सिंह और प्रकाश राज ने भी लाजवाब अभिनय किया है। हाँ, दलीप ताहिल, नेहरु के किरदार में फिट नहीं बैठते। 

शंकर-एहसान-लॉय का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म का एक और प्लस पॉइंट है। फिल्म के सारे गाने बेहतरीन हैं। इनमे मेरा पसंदीदा गाना 'ओ रंगरेज़' है।

जैसा की इस साल की ज्यादातर फिल्मों के साथ होता आया है, इस फिल्म की लम्बाई भी कुछ कम की जा सकती थी। लेकिन प्रसून जोशी और राकेश मेहरा के लिये इसे समेटना काफी मुश्किल रहा होगा। स्क्रिप्ट उलझी हुयी है। कहानी फ्लैशबैक और फिर फ्लैशबैक में चलती है। फिल्म ज्यादा प्रभाव छोड़ पाती अगर इसे सिंपल तरीके से कहा जाता। लेकिन तब शायद दर्शकों को इमोशनली कनेक्ट करना मुश्किल हो जाता।

रेटिंग: ***

24 July 2013

डी-डे (2013)

दाउद अब्राहम के बारे में जितनी जानकारी बॉलीवुड वालों को है, उतनी शायद R&AW के पास भी नहीं होगी। वह हमेशा से बॉलीवुड फिल्मकारों का पसंदीदा पात्र रहा है। अनुराग कश्यप की बेहतरीन ब्लैक फ्राइडे (२००७) से लेकर मिलन लुथरिया की वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई (२०१०) तक हम उसे देखते आये हैं। हालांकि, हमारे फिल्मकार हमेशा से उसका सीधा नाम लेने से बचते रहे हैं। 

इस फिल्म में निखिल आडवाणी ने दाउद को इकबाल खान के रूप मे पेश किया है। लेकिन बावजूद इसके, कि वह भारत का नं. १ मोस्ट वांटेड है, हम उससे नफरत नहीं करते। वह १९९३ के बम्बई बम धमाकों से लेकर २०१३ के हैदराबाद धमाकों का ज़िम्मेदार है। ऋषि कपूर (जो इस समय अपने टॉप फॉर्म में चल रहे हैं) ने यह भूमिका निभाई है।

इकबाल कराची में छुपा हुआ है। भारत सरकार 'अमन की आशा' के चलते कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। ऐसे में उसे पकड़ने के लिये R&AW चीफ अश्वनी राव (नासर) एक सीक्रेट प्लान बनाते हैं। इस मिशन 'ऑपरेशन गोल्डमैन' में वली खान (इरफ़ान), रूद्र (अर्जुन रामपाल), जोया (हुमा कुरैशी) और असलम (आकाश दहिया) शामिल हैं। इन्हें इकबाल को जिंदा पकड़ के भारत के हवाले करना है।

इसके लिए ये चारों इकबाल के अपहरण की योजना बनाते हैं। लेकिन ऐन मौके पर ये मिशन फेल हो जाता है। ये फिल्म का शुरूआती दृश्य है। और फिर हम मिशन के पहले और बाद की कहानी देखते हैं।

फिल्म के मेल एक्टर्स अपने अपने किरदार में फिट हैं। इरफ़ान कई दृश्यों में बिना डायलॉग के अपनी आँखों से काफी कुछ कह जाते हैं। हुमा कुरैशी कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाती। 

इंटरवल के बाद स्क्रिप्ट बिखरी हुयी सी लगती है। दृश्यों को बेवजह लम्बा खिंचा गया है। गाने बैकग्राउंड में होने के बावजूद फिल्म की गति को कम करती है। निर्देशक और स्क्रिप्ट लेखक अगर चाहते तो फिल्म की लम्बाई २० मिनट आसानी से कम कर सकते थे। और तब शायद ये एक बेहतरीन फिल्म होती। 

रेटिंग: **1/2

22 March 2013

आत्मा (2013)

ये फिल्म सिर्फ डेढ़ घंटे की है। हालांकि मेरा मानना है कि हॉरर फिल्में सिर्फ एक घंटे की होनी चाहिए, क्योंकि ऑडियंस इसे इससे ज्यादा झेल नहीं सकती और उसके बाद उनका सर दर्द बढ़ने लगता है। (वैसे ये बात पिछले हफ्ते रिलीज़ हॉरर फिल्म 3जी के सन्दर्भ में कही गयी है।)

किसी हॉरर फिल्म से ये उम्मीद करना की वो आपको बुरी तरह से डरा देगी, गलत होगा।  मुझे नहीं लगता कोई भी फिल्म दर्शकों को डराने में कामयाब हो सकती है। और अगर कोई फिल्म उन्हें डराने की जितनी  कोशिश करेगी, वे उतना ही खुल कर हंसेंगे। 

हम में से ज्यादातर लोग भूत, प्रेत या आत्माओं पे यकीन नहीं करते। मैं भी नहीं करता हूँ। इसके बावजूद हम लोग हॉरर फिल्मों को काफी पसंद करते हैं। ज्यादातर हॉरर फिल्मों की स्टोरी एक जैसी ही होती है। यहाँ भी सीन कुछ ऐसा ही है। लेकिन यहाँ स्क्रिप्ट काफी कसी हुयी है। 

अभय (नवाज़ुद्दीन) के शक्की और हिंसक रवैय्ये से परेशान माया (बिपाशा) ने उससे तलाक ले लिया। उसके फ़ौरन बाद अभय की मौत एक कार एक्सीडेंट में हो गयी। अभय अपनी बेटी निया से बहुत प्यार करता था। अभय की मौत के कुछ समय बाद माया को लगता है की निया अपने पापा से बातें करती रहती है। उसे काफी बुरे सपने भी आते रहते हैं। उसे ऐसा लगता है की अभय, निया को अपने साथ ले जाना चाहता है। एक पंडितजी या आध्यात्मिक गुरु (दर्शन ज़रीवाला) इस बात को कन्फर्म भी करते हैं। माया किसी भी कीमत पे अपनी बेटी की ज़िन्दगी बचाना चाहती है। 

साधारण कहानी के बावजूद निर्देशक सुपर्ण वर्मा की स्क्रिप्ट काफी कसी हुयी है। दोनों लीड एक्टर्स ने बेहतरीन अभिनय किया है। खासकर नवाज़ुद्दीन जिस सीन में आये, छा गये। हालांकि उन्हें कम फुटेज मिली है। निया के रोल में डॉयल धवन प्रभावित करती हैं। बांकी एक्टर्स साधारण रहे हैं। 

ये फिल्म विक्रम भट्ट और राम गोपाल वर्मा की बिना स्क्रिप्ट वाली हॉरर फिल्मो से कहीं बेहतर है। कम से कम हॉरर फिल्म के दर्शक वर्ग को ये निराश नहीं करेगी। 

रेटिंग: **1/2

13 March 2013

भूत रिटर्न्स (2012)

शायद राम गोपाल वर्मा इकलौते ऐसे साहसी निर्देशक हैं, जो फ्लॉप्स और आलोचनाओं के बावजूद हर साल 2-3 फिल्में बनाते हैं। 

इस फिल्म को मनीषा कोइराला की कमबैक फिल्म कह के प्रचारित किया गया था। लेकिन ये मनीषा की 'गोबैक' फिल्म साबित हो सकती है। ऐसी फिल्म से 'कमबैक' करने से किसी का भी करियर खराब  हो सकता है।

ये फिल्म राम गोपाल वर्मा निर्देशित 'भूत' (2003) का तथाकथित सीक्वल है। भूत (2003) अभिनय और तकनीक, दोनों दृष्टि से अच्छी थी। भूत रिटर्न्स इन दोनों लिहाज़ से कम से कम अच्छी नहीं कही जा सकती। डिपार्टमेंट (2011) में कैमरे से एक्सपेरिमेंट कर चुके वर्मा इस फिल्म को भी 'टेबल के नीचे' और 'पंखे के ऊपर' से शूट करते हैं। ये फिल्म 3डी  में भी रिलीज़ की गयी थी। हालांकि, मैंने इस फिल्म को 1डी (डीवीडी) में देखा।

पूरी फिल्म एक घर के इर्द गिर्द घुमती है। "दुनिया में करोड़ों घर होते हैं, लेकिन पता नहीं क्यों कुछ ही घरों को भूत पसंद करते है," जैसा की इस फिल्म में बताया गया है। ये घर उन्ही में से एक है। इस घर में एक कपल अपने बच्चों के साथ अभी अभी शिफ्ट हुए हैं। घर में आने के बाद उनके साथ अजीबोगरीब घटनाएं होने लगती है। 

ये फिल्म कहीं कहीं बहुत ज्यादा फनी हो गयी है। और इस तरह की फिल्मों के साथ ऐसा अक्सर हो जाता है। राम गोपाल वर्मा ने बिना स्क्रिप्ट के बहुत सी हॉरर फिल्में बनायी हैं और ये फिल्म भी अपवाद नहीं है। 

रेटिंग: *1/2

30 December 2012

ओएमजी: ओ माय गॉड (2012)

अक्षय कुमार और परेश रावल ने एक साथ बहुत सी फिल्मों में काम किया है। लेकिन शायद ये पहला मौका है कि अक्षय एक सपोर्टिंग रोल में हैं और परेश लीड रोल में।

परेश रावल उन चुनिन्दा बेहतरीन एक्टर्स में से हैं जो फिल्मों के साथ थिएटर भी करते हैं। ये फिल्म परेश के ही गुजराती नाटक 'किशन वर्सेस कन्हैय्या' का स्क्रीन एडाप्टेशन है। उस नाटक के लीड रोल में भी परेश ही थे। परेश इस फिल्म के प्रोड्यूसर भी हैं।

कांजीलालजी मेहता (परेश रावल हमेशा की तरह बेहतरीन) की दुकान एक भूकंप में धराशायी हो जाती है। इंश्योरेंस कंपनी इसे 'एक्ट ऑफ़ गॉड' बताकर पैसे देने से मना करती है। जाने अनजाने में यह प्रकरण हमें बताती है की इंश्योरेंस पेपर्स साइन करते समय उसके 'टर्म्स एंड कंडीशन्स' पढना कितना जरुरी है। कांजीलालजी के पास भगवान के खिलाफ केस करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता। सवाल ये भी है कि भगवान सचमुच में हैं या नहीं। यानी भगवान के पास खुद को साबित करने की भी चुनौती है।

भगवान पे केस करने के बाद कांजी भाई मुसीबत में फंस जाते हैं। ऐसे में भगवान को उन्हें बचाने खुद आना पड़ता है। और यहीं से फिल्म की स्क्रिप्ट कमजोर होनी शुरू हो जाती है। इस मॉडर्न भगवान (कृष्ण वासुदेव यादव) की भूमिका अक्षय कुमार ने निभायी है, जिनकी लेटेस्ट फोटो अभी 'फेसबुक' पर अपडेट नहीं हुयी है।

फिल्म में ढोंगी धर्मगुरुओं और धर्म के नाम पर चल रहे व्यापार की पोल खोलने की कोशिश की गयी है। फिल्म के डायलॉग्स काफी तीखे हैं।

निर्देशक उमेश शुक्ला ने स्क्रिप्ट को अच्छे से हैंडल करने की कोशिश की है। लेकिन आखरी आधे घंटे में वो गड़बड़ा गये। शायद फिल्म को कमर्शियल बनाने के चक्कर में। फिल्म का क्लाइमेक्स निश्चित ही कमज़ोर है। आइटम सौंग की कोई जरुरत नहीं थी।

फिल्म पूरी तरह से परेश रावल की है। अन्य रोल में मिथुन प्रभावित करते हैं। शायद उनका रोल श्री आसाराम बापू से प्रभावित है। फिल्म में एक जगह वो कहते हैं कि 'धर्म एक अफीम है जिसकी लत आसानी से नहीं छूटती'। निश्चित ही वो सही हैं।

रेटिंग: **1/2